तकनीक, पारदर्शिता और ठोस कार्रवाई से बदलता प्रदेश का खनन क्षेत्र
लखनऊ।उत्तर प्रदेश प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से देश के प्रमुख राज्यों में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। प्रदेश की नदियों, भूगर्भीय संरचनाओं और विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्ध खनिज संपदा ने सदैव राज्य के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बालू, मोरम, गिट्टी और अन्य खनिजों का वैज्ञानिक एवं नियंत्रित दोहन जहां विकास कार्यों की आवश्यकताओं को पूरा करता है, वहीं इससे प्राप्त होने वाला राजस्व राज्य की अर्थव्यवस्था को भी सुदृढ़ बनाता है। प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश के भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग ने बीते वर्षों में खनन क्षेत्र को पारदर्शी, तकनीक आधारित, उत्तरदायी और पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
प्रदेश सरकार की स्पष्ट नीति रही है कि प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग विकास के लिए आवश्यक है, लेकिन उनका दोहन वैज्ञानिक, नियंत्रित और सतत होना चाहिए। इसी सोच के साथ उत्तर प्रदेश में खनन व्यवस्था में व्यापक सुधार किए गए हैं। खनन से प्राप्त राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि, अवैध खनन एवं परिवहन पर तकनीक के माध्यम से नियंत्रण, ऑनलाइन सेवाओं का विस्तार, ई-नीलामी, इंटीग्रेटेड माइन सर्विलांस सिस्टम, RFID एवं AI आधारित चेकपोस्ट तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए एम-सैंड नीति जैसे कदम उत्तर प्रदेश के खनन क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत के प्रतीक हैं।
उत्तर प्रदेश में खनन क्षेत्र की प्रगति का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष राजस्व में हुई उल्लेखनीय वृद्धि है। वर्ष 2012 से 2017 के बीच जहां खनन से प्राप्त कुल राजस्व लगभग 4,700 करोड़ रुपये था, वहीं वर्ष 2017 से मार्च 2026 तक खनन से प्राप्त कुल राजस्व लगभग 30,524 करोड़ रुपये से अधिक हो गया। यह उपलब्धि खनन व्यवस्था में आए व्यापक सुधार, पारदर्शिता और प्रभावी प्रशासन का प्रमाण है। वर्ष 2017 से 2026 के बीच औसत राजस्व में लगभग साढ़े छह गुना की वृद्धि प्रदेश सरकार की प्रभावी नीतियों और तकनीक आधारित व्यवस्थाओं की सफलता को दर्शाती है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश सरकार ने खनन क्षेत्र को केवल राजस्व अर्जन के माध्यम के रूप में ही नहीं देखा, अपितु इसे सुशासन, रोजगार, विकास और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जोड़कर एक व्यापक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाया है। यही कारण है कि खनन पट्टों के आवंटन से लेकर खनिजों के परिवहन तक की व्यवस्था को अधिकाधिक डिजिटल बनाया गया है। इससे जहां मानवीय हस्तक्षेप कम हुआ है, वहीं पारदर्शिता और जवाबदेही भी बढ़ी है।
गौरतलब है कि वित्तीय वर्ष 2022-23 से अब तक प्रदेश में मुख्य खनिजों के 10 ब्लॉकों को कम्पोजिट लाइसेंस तथा 3 ब्लॉकों को खनन पट्टे पर सफलतापूर्वक आवंटित करते हुए आवश्यक कार्रवाई की गई है। खनिज क्षेत्रों के वैज्ञानिक सर्वेक्षण और नई संभावनाओं की खोज पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। प्रदेश में संचालित खनन पट्टों के समीपवर्ती क्षेत्रों तथा नए रिक्त क्षेत्रों का उन्नत तकनीक के माध्यम से अध्ययन कराया जा रहा है। निदेशालय की प्रयोगशालाओं में आधुनिक तकनीक और भू-वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर संभावित अवैध खनन क्षेत्रों तथा नए खनिज क्षेत्रों का चिन्हांकन किया जा रहा है।
आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक विश्लेषण के माध्यम से प्रदेश में अब तक 66 संभावित अवैध खनन क्षेत्रों का चिन्हांकन किया गया है। इन क्षेत्रों के संबंध में संबंधित जिलाधिकारियों द्वारा नियमानुसार कार्रवाई भी सुनिश्चित की गई है, जिससे लगभग 2.19 करोड़ रुपये के राजस्व की प्राप्ति हुई है। यह व्यवस्था बताती है कि अब खनन विभाग केवल शिकायतों या पारंपरिक निरीक्षण पर निर्भर होने के बजाय तकनीक के माध्यम से संभावित अनियमितताओं की पहचान कर समयबद्ध कार्रवाई कर रहा है।
खनन से संबंधित सभी प्रमुख सेवाओं को एक ही छत के नीचे लाने के उद्देश्य से प्रदेश सरकार ने ‘माइनमित्र पोर्टल’ विकसित किया है। यह पोर्टल खनन क्षेत्र में डिजिटल क्रांति का एक जबरदस्त उदाहरण है। माइनमित्र पोर्टल के माध्यम से पट्टाधारकों, भंडारणकर्ताओं और आम नागरिकों को अनेक ऑनलाइन सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। इससे खनन से जुड़ी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता आई है और लोगों को कार्यालयों के अनावश्यक चक्कर लगाने से भी मुक्ति मिली है।
‘ऑनलाइन खनिज प्रबंधन’ व्यवस्था के अंतर्गत पट्टाधारकों एवं भंडारणकर्ताओं के लिए आवश्यक ई-फॉर्म, विभिन्न सेवाओं के लिए आवेदन तथा लीज धनराशि के ऑनलाइन भुगतान की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। डिजिटल व्यवस्था के माध्यम से प्रक्रियाओं को सरल और समयबद्ध बनाया गया है। यह परिवर्तन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उस सुशासन की अवधारणा को साकार करता है, जिसमें सरकारी सेवाएं अधिकतम पारदर्शी और नागरिकों के लिए सुगम हों।
माइनमित्र पोर्टल पर आम नागरिकों और किसानों के लिए भी अनेक महत्वपूर्ण ऑनलाइन सेवाएं उपलब्ध कराई गई हैं। निजी भूमि, साधारण मिट्टी तथा भवन एवं विकास परियोजनाओं से निकलने वाले उपखनिजों के निस्तारण से संबंधित प्रक्रियाओं को ऑनलाइन किया गया है। भंडारण लाइसेंस, ऑनलाइन आवेदन, खनिज पट्टा संबंधी व्यवस्थाएं, खनिजों के फुटकर विक्रेताओं का पंजीकरण और किसानों के व्यक्तिगत उपयोग के लिए साधारण मिट्टी के खनन हेतु पंजीकरण जैसी सुविधाएं डिजिटल माध्यम से उपलब्ध कराई गई हैं। खनन योजना के अनुमोदन की प्रक्रिया भी अधिक सुगम बनाई गई है।
उदाहरणार्थ सितंबर 2021 से जुलाई 2026 तक माइनमित्र पोर्टल के माध्यम से 4,71,653 आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें से 4,66,920 आवेदनों का निस्तारण किया गया। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म ने विभागीय कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने के साथ-साथ जनता का विश्वास भी बढ़ाया है। पारदर्शी और ऑनलाइन व्यवस्था से भ्रष्टाचार एवं अनावश्यक मानवीय हस्तक्षेप की संभावनाओं में कमी आई है।
अवैध खनन और खनिजों के अवैध परिवहन पर प्रभावी नियंत्रण के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने ‘इंटीग्रेटेड माइन सर्विलांस सिस्टम’ यानी आईएमएस को अत्यंत प्रभावी माध्यम के रूप में विकसित किया है। इस व्यवस्था के अंतर्गत खनन क्षेत्रों की जियो-फेंसिंग की गई है। खनिजों का परिवहन करने वाले वाहनों पर RFID माइंस टैग लगाए गए हैं तथा प्रदेश के विभिन्न स्थानों पर आधुनिक, मानव रहित, स्वचालित IoT और AI आधारित चेकपोस्ट स्थापित किए गए हैं।
इन चेकपोस्ट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनका संचालन तकनीक के माध्यम से किया जा रहा है। वाहनों की पहचान, खनिज परिवहन की निगरानी और संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी स्वचालित रूप से विभागीय कमांड सेंटर तक पहुंचती है। इससे अवैध परिवहन के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई संभव हो रही है। कमांड सेंटर के माध्यम से विभिन्न जिलों में हो रही गतिविधियों की निरंतर निगरानी की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित जनपदों को ई-नोटिस भी जारी किए जाते हैं।
प्रदेश में आईएमएस व्यवस्था के तहत 62 स्वचालित चेकपोस्ट संचालित किए जा रहे हैं, जबकि 27 जनपदों को इस तकनीकी व्यवस्था के दायरे में लाया गया है। 1,53,942 से अधिक वाहनों पर माइंस टैग लगाए जा चुके हैं तथा 75 RFID रीडर भी स्थापित किए गए हैं। 16 जुलाई 2026 तक 2,41,472 ई-नोटिस जारी किए गए, जिनमें लगभग 998 करोड़ रुपये की धनराशि निहित थी। इनमें से लगभग 756 करोड़ रुपये की धनराशि की वसूली भी की गई है। यह व्यवस्था अवैध खनन और परिवहन के विरुद्ध प्रदेश सरकार की सख्त और प्रभावी नीति का प्रमाण है।
प्रदेश सरकार के समक्ष खनन क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक लंबे समय से अवैध खनन और संगठित खनन माफियाओं की गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना रहा है। प्राकृतिक संसाधनों के अवैध दोहन से न केवल सरकार को राजस्व की हानि होती है, बल्कि नदियों, पर्यावरण और स्थानीय पारिस्थितिकी पर भी गंभीर प्रभाव पड़ता है। कई स्थानों पर अवैध खनन से जुड़े तत्व नियमों को दरकिनार कर रात के समय अथवा दुर्गम क्षेत्रों में अवैध खनन एवं परिवहन का प्रयास करते रहे हैं।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश सरकार ने इस चुनौती को गंभीरता से लेते हुए अवैध खनन और खनन माफियाओं के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई है। सरकार का स्पष्ट संदेश है कि प्रदेश की प्राकृतिक संपदा पर किसी भी व्यक्ति अथवा संगठित गिरोह का अवैध अधिकार स्वीकार नहीं किया जाएगा। अवैध खनन, अवैध परिवहन, ओवरलोडिंग और खनिजों के अनियमित भंडारण के मामलों में संबंधित विभागों को कठोर और प्रभावी कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।
सरकार की रणनीति केवल कार्रवाई तक सीमित न होकर अवैध गतिविधियों को होने से पहले ही चिन्हित करने पर भी केंद्रित है। यही कारण है कि अब खनन माफियाओं के विरुद्ध तकनीक को सबसे प्रभावी हथियार के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। जियो-फेंसिंग के माध्यम से खनन क्षेत्रों की सीमाओं की निगरानी, RFID टैग से वाहनों की पहचान, GPS के माध्यम से वाहनों की गतिविधियों का अनुश्रवण और AI आधारित कैमरों से संदिग्ध गतिविधियों की पहचान जैसी व्यवस्थाओं ने अवैध खनन करने वाले तत्वों के लिए बच निकलना कठिन बनाया है।
अवैध खनन में संलिप्त पाए जाने वाले व्यक्तियों और संगठित गिरोहों के विरुद्ध नियमानुसार दंडात्मक कार्रवाई, जुर्माना, वाहनों की जब्ती तथा अन्य कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई की व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाया गया है। जिला प्रशासन, पुलिस, परिवहन विभाग और भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर संयुक्त कार्रवाई की प्रणाली को मजबूत किया गया है। इससे खनन माफियाओं के विरुद्ध कार्रवाई केवल एक विभाग तक सीमित न रहकर बहु-विभागीय और अधिक प्रभावी बनी है।
तकनीक आधारित निगरानी ने इस लड़ाई में विशेष भूमिका निभाई है। पहले अवैध खनन की सूचना मिलने के बाद अधिकारियों को मौके पर पहुंचकर जांच करनी पड़ती थी, जिसमें समय लगता था और कई बार अवैध गतिविधियों में संलिप्त लोग बच निकलते थे। अब कमांड सेंटर, डिजिटल डेटा और स्वचालित निगरानी प्रणाली के माध्यम से संदिग्ध गतिविधियों की पहचान पहले ही की जा सकती है। इससे संबंधित जनपदों को तत्काल सूचना भेजकर कार्रवाई सुनिश्चित की जा रही है।
प्रदेश सरकार के समक्ष चुनौती केवल खनन माफियाओं पर कार्रवाई करने की ही नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि वैध खनन कारोबार करने वाले लोगों को अनावश्यक परेशानी न हो। इसलिए सरकार ने एक ऐसी व्यवस्था विकसित करने का प्रयास किया है, जिसमें वैध खनन और परिवहन को सरल बनाया जाए तथा अवैध गतिविधियों के विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई हो। माइनमित्र पोर्टल, ऑनलाइन ई-फॉर्म, डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन अनुमतियों की व्यवस्था इसी संतुलित नीति का परिणाम है।
खनन क्षेत्र में व्यापक सुधारों के बावजूद प्रदेश सरकार के समक्ष कई महत्वपूर्ण चुनौतियां भी हैं. उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में बड़ी संख्या में नदियां, खनिज क्षेत्र और परिवहन मार्ग हैं। ऐसे में प्रत्येक खनन क्षेत्र और प्रत्येक खनिज वाहन की निरंतर निगरानी एक जटिल कार्य है। खनन क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां, दूरस्थ स्थान और विभिन्न जिलों के बीच समन्वय भी प्रशासनिक चुनौती प्रस्तुत करते हैं।
अवैध खनन में संलिप्त तत्व समय-समय पर नए तरीके अपनाने का प्रयास करते हैं। फर्जी दस्तावेजों का उपयोग, निर्धारित मार्ग से अलग रास्तों का प्रयोग, वाहनों की पहचान बदलना और तकनीकी व्यवस्था से बचने के प्रयास जैसी चुनौतियां प्रशासन के सामने बनी रहती हैं। इसलिए सरकार को तकनीकी प्रणालियों को लगातार अपडेट करने और निगरानी तंत्र को और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता है।
एक महत्वपूर्ण चुनौती पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाए रखना भी है। प्रदेश में तेजी से बढ़ते निर्माण कार्यों, एक्सप्रेसवे, औद्योगिक परियोजनाओं और आवासीय विकास के कारण बालू, गिट्टी और अन्य उपखनिजों की मांग निरंतर बढ़ रही है। ऐसे में विकास कार्यों के लिए आवश्यक खनिजों की उपलब्धता सुनिश्चित करते हुए नदियों और पर्यावरण की सुरक्षा करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए प्रदेश सरकार ने पर्यावरण संरक्षण को भी खनन नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है। नदियों से बालू और मोरम के अनियंत्रित दोहन से नदी तल और आसपास के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखते हुए प्रदेश सरकार ने एम-सैंड नीति, 2024 को 16 अक्टूबर 2024 को प्रख्यापित किया। इस नीति का उद्देश्य प्राकृतिक नदियों से प्राप्त बालू और मोरम के विकल्प के रूप में कृत्रिम रूप से तैयार की जाने वाली एम-सैंड को बढ़ावा देना है।
एम-सैंड अर्थात मैन्युफैक्चर्ड सैंड निर्माण कार्यों के लिए एक उपयोगी विकल्प है। इसके प्रयोग को प्रोत्साहित करने से नदियों से बालू और मोरम के अत्यधिक दोहन को कम करने में सहायता मिलेगी। यह नीति सतत विकास की दिशा में एक दूरदर्शी कदम है। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करने की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नीति इस निर्णय में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
प्रदेश में चेकपोस्ट व्यवस्था को और प्रभावी बनाने के लिए ‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ की अवधारणा को भी लागू किया गया है। अन्य राज्यों की तुलना में उत्तर प्रदेश की व्यवस्था को अधिक प्रतिस्पर्धी और प्रभावी बनाने के उद्देश्य से विभिन्न नियमों में आवश्यक सुधार किए गए हैं। अवैध परिवहन और ओवरलोडिंग पर अंकुश लगाने के लिए विनियमन शुल्क में भी आवश्यक परिवर्तन किए गए हैं। इससे वैध कारोबार को प्रोत्साहन और अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण दोनों सुनिश्चित किए जा रहे हैं।
उपखनिजों के परिवहन की निगरानी के लिए भी आधुनिक सॉफ्टवेयर विकसित किया गया है। वाहनों के पंजीकरण की प्रक्रिया को डिजिटल बनाया गया है। 15 जुलाई 2026 तक लगभग 69,425 उपखनिज परिवहन करने वाले वाहनों का पंजीकरण किया जा चुका है तथा 51,378 वाहनों पर GPS उपकरणों के इंटीग्रेशन की कार्रवाई की गई है। इससे वाहनों की आवाजाही पर निगरानी रखी जा सकेगी और निर्धारित मार्ग तथा नियमों के उल्लंघन की स्थिति में त्वरित कार्रवाई संभव होगी।
विभागीय गतिविधियों के सघन अनुश्रवण और विश्लेषण के लिए निदेशालय स्तर पर अत्याधुनिक कमांड सेंटर की स्थापना की गई है। यह कमांड सेंटर खनन क्षेत्र की डिजिटल निगरानी का केंद्र है। यहां विभिन्न तकनीकी माध्यमों से प्राप्त सूचनाओं का विश्लेषण किया जाता है और संदिग्ध गतिविधियों की पहचान कर संबंधित जिलों को कार्रवाई के लिए निर्देशित किया जाता है। इसी प्रकार विभागीय गतिविधियों के प्रभावी संचालन के लिए प्रोजेक्ट मैनेजमेंट यूनिट की भी स्थापना की गई है।
खनिजों के अवैध परिवहन और ओवरलोडिंग को रोकने के लिए प्रदेश के 27 जनपदों में मुख्य मार्गों पर 62 स्थानों पर कैमरों और स्वचालित RFID रीडर युक्त चेकपोस्ट स्थापित किए गए हैं। इन चेकपोस्ट के माध्यम से वाहनों की स्वचालित पहचान की जाती है। कार्रवाई की सूचना ऑनलाइन ई-नोटिस और ई-चालान के माध्यम से भेजी जाती है। इस प्रणाली को भारत सरकार के परिवहन मंत्रालय से संबंधित वाहन और वाहन स्वामी की जानकारी प्राप्त करने वाली तकनीकी व्यवस्था से भी जोड़ा गया है। इससे वाहन और उसके स्वामी की जानकारी तत्काल उपलब्ध हो जाती है और कार्रवाई अधिक प्रभावी बनती है।
उत्तर प्रदेश में अन्य राज्यों से आने वाले खनिज वाहनों की निगरानी के लिए भी प्रदेश के पोर्टल को संबंधित राज्यों के API से जोड़ा गया है। इससे अन्य राज्यों से प्रदेश में प्रवेश करने वाले वाहनों की भी निरंतर निगरानी और जांच की जा रही है। वर्तमान में मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों की संबंधित व्यवस्थाओं से तकनीकी एकीकरण किया जा चुका है। यह कदम खनिज परिवहन की निगरानी को और अधिक मजबूत बनाता है।
खनिज वाहनों द्वारा की जा रही ओवरलोडिंग पर नियंत्रण के लिए विभाग ने परिवहन विभाग के सहयोग से आधुनिक तकनीक आधारित व्यवस्था विकसित की है। प्रमुख मार्गों पर IoT और AI आधारित मानव रहित चेकपोस्ट के साथ आधुनिक वे-इन-मोशन प्रणाली स्थापित की जा रही है। इससे चलते हुए वाहनों के वजन और अन्य गतिविधियों की जांच की जा सकेगी। यह व्यवस्था पारंपरिक जांच प्रणाली की तुलना में अधिक तेज, पारदर्शी और प्रभावी सिद्ध होगी।
खनन क्षेत्र में नीतिगत सुधार भी प्रदेश सरकार की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। जिला खनिज फाउंडेशन न्यास नियमावली में आवश्यक संशोधन किए गए हैं। इसके अतिरिक्त खनन और खनिज विकास एवं विनियमन अधिनियम, 1957 की धारा 21(5) तथा उत्तर प्रदेश उपखनिज नियमावली, 2021 में आवश्यक संशोधन कर अधिकारियों को अधिक प्रभावी कार्रवाई के लिए सशक्त बनाया गया है। इससे न्यायालयों में होने वाली कानूनी जटिलताओं को कम करने और विभागीय कार्रवाई को मजबूत आधार प्रदान करने में सहायता मिली है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश का खनन क्षेत्र आज परंपरागत व्यवस्था से निकलकर आधुनिक तकनीक, पारदर्शिता और सतत विकास की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। माइनमित्र पोर्टल ने जहां नागरिकों और व्यवसायियों को ऑनलाइन सेवाओं से जोड़ा है, वहीं आईएमएस, जियो-फेंसिंग, RFID, GPS, IoT, AI आधारित चेकपोस्ट और कमांड सेंटर ने अवैध खनन एवं परिवहन पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया है।
खनन माफियाओं के विरुद्ध सख्त कार्रवाई और तकनीक आधारित निगरानी व्यवस्था ने यह संदेश दिया है कि प्रदेश में प्राकृतिक संसाधनों का अवैध दोहन किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा। सरकार की चुनौती केवल अवैध खनन को रोकना नहीं, बल्कि एक ऐसी स्थायी और पारदर्शी व्यवस्था विकसित करना है, जिसमें ईमानदार कारोबारियों को सुविधा, सरकार को उचित राजस्व और पर्यावरण को पर्याप्त संरक्षण मिल सके।
खनन से राजस्व में कई गुना वृद्धि प्रदेश की आर्थिक मजबूती का संकेत है, वहीं एम-सैंड नीति पर्यावरण संरक्षण के प्रति सरकार की गंभीरता को प्रदर्शित करती है। तकनीक आधारित निगरानी व्यवस्था ने यह सिद्ध किया है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति, स्पष्ट नीति और आधुनिक तकनीक का समन्वय हो तो जटिल से जटिल क्षेत्र में भी व्यापक सुधार संभव है।
आज उत्तर प्रदेश का भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग केवल खनिजों के प्रबंधन तक सीमित नहीं है, अपितु वह पारदर्शी शासन, डिजिटल तकनीक, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के समन्वित मॉडल के रूप में उभर रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में खनन क्षेत्र में स्थापित यह नई व्यवस्था आने वाले समय में प्रदेश के विकास को और गति देगी तथा उत्तर प्रदेश को प्राकृतिक संसाधनों के वैज्ञानिक, पारदर्शी और सतत प्रबंधन के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में स्थापित करेगी।
आदर अदीब पावेल बन्धु
जिला सूचना अधिकारी
लखनऊ
























