बलिया।“अंकल, साइकिल दिला दीजिए…” — एक पैर पर स्कूल जाने वाली रागिनी की पुकार सीएम योगी तक पहुंची; सरकार उठाएगी इलाज का पूरा खर्च, BHU में होगी विशेष जांच

अंकल, साइकिल दिला दीजिए…” — एक पैर पर स्कूल जाने वाली रागिनी की पुकार सीएम योगी तक पहुंची; सरकार उठाएगी इलाज का पूरा खर्च, BHU में होगी विशेष जांच

 संजीव सिंह बलिया। जनपद के मनियर ब्लॉक की 7 वर्षीय रागिनी ने डीएम से भावुक अपील की थी; वायरल वीडियो के बाद दो ट्राइसाइकिल, पढ़ाई का सामान और अब प्रदेश सरकार के निर्देश पर बेहतर उपचार की राह खुली

 जिले के मनियर ब्लॉक अंतर्गत रानीपुर गांव की निवासी सात वर्षीय रागिनी दिघेड़ा गांव के प्राथमिक विद्यालय में कक्षा एक की छात्रा है। एक पैर में दिव्यांगता के बावजूद वह रोज़ 400 मीटर की दूरी कूदते-कूदते तय कर स्कूल जाती थी, रास्ते में थककर बैठ जाती और दर्द होने पर रोने लगती थी।

31 अगस्त को उसने जिलाधिकारी मंगला प्रसाद सिंह से भावुक होकर कहा—“अंकल, साइकिल दिला दीजिए… मैं खूब पढ़ना चाहती हूं।” यह अपील इंटरनेट/सोशल मीडिया पर तेजी से फैली और मामला मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक पहुंच गया।

प्रशासनिक पहल: दो ट्राइसाइकिल, स्कूल किट और इलाज का भरोसा

बुधवार को डीएम स्वयं रागिनी के गांव पहुंचे और उसे एक नहीं, बल्कि दो ट्राइसाइकिलें सौंपीं; साथ ही स्कूल बैग, कॉपी-किताब, चॉकलेट व अन्य जरूरी सामान दिया गया। साइकिल मिलने पर रागिनी ने मासूमियत से कहा—“अब मुझे और कुछ नहीं चाहिए।”

गुरुवार को जिला अस्पताल में उसका मेडिकल परीक्षण कराया गया। सीएमओ डॉ. अभय नारायण राय और हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. करन सिंह चौहान की मौजूदगी में जांच के बाद तय हुआ कि कुछ विशेष जांचें बलिया में संभव नहीं हैं, इसलिए उसे वाराणसी स्थित बीएचयू (BHU) भेजा जाएगा। डीएम ने स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री के निर्देशानुसार इलाज का पूरा खर्च प्रदेश सरकार उठाएगी और लक्ष्य है कि रागिनी अपने पैरों पर खड़ी हो सके।

समाज से भी बढ़े मदद के हाथ

रागिनी की कहानी सामने आने के बाद फिजिक्स वाला (Physics Wallah) के सह-संस्थापक व सीईओ अलख पांडेय ने बच्ची के इलाज के लिए 10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता भेजी है। इसके अलावा आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह की ओर से भी 26 हजार रुपये की सहायता भेजे जाने की जानकारी सामने आई है।

पारिवारिक पृष्ठभूमि

रागिनी के पिता देवेंद्र राजभर हैदराबाद में मजदूरी करते हैं; वह गांव में अपनी मां बबीता देवी और दादा-दादी के साथ रहती है। बबीता देवी के मुताबिक, जब रागिनी लगभग छह माह की थी तब दुर्घटना में उसके पैर में गंभीर चोट लगी; इलाज हुआ पर पैर पूरी तरह ठीक नहीं हो सका। आर्थिक तंगी के बावजूद परिवार ने इलाज जारी रखा, पर अपेक्षित लाभ नहीं मिला।

आगे की कार्ययोजना

जिला प्रशासन ने शनिवार को रागिनी को वाराणसी BHU ले जाने की तैयारी की है।

वहां विशेष जांचों के बाद ऑपरेशन या अन्य संभावित उपचार पर फैसला लिया जाएगा।

प्रदेश सरकार इलाज का पूरा व्यय वहन करेगी; जरूरत पड़ने पर लखनऊ या अन्य केंद्रों पर भी उपचार की व्यवस्था की जाएगी।

रागिनी की “पढ़ाई की ललक” ने न सिर्फ प्रशासन को संवेदनशील बनाया, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों को भी एकजुट किया। अब चुनौती है—समय पर विशेष जांच और सटीक उपचार से उसे वास्तव में “अपने पैरों पर खड़ा” करना।

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