23 वर्ष बाद अधिवक्ता इन्द्रदेव सिंह के परिजनों को मिला न्याय तीन पर दोष सिद्ध 7 को होगा सज़ा का ऐलान
इंद्रदेव सिंह की हत्या से हिल गई थी लखनऊ की सियासत और ब्यूरोक्रेसी सीबीआई जांच में हुआ था खुलासा
प्रमोद श्रीवास्तव
लखनऊ : वर्ष 2002 को 8 अगस्त को लखनऊ के केसरबाग इलाके में दिनदहाड़े बार संघ के पूर्व अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता इन्द्रदेव सिंह की गोली मारकर बेरहमी से हत्या हो जाने से पूरे प्रदेश के कानूनी और प्रशासनिक हलकों में खलबली मचा दी थी इस हत्याकांड ने प्रदेश की कानून व्यवस्था को चुनौती देते हुए राजनीति सरगर्मियां भी तेज कर दी थी क्योंकि इस हत्याकांड ने न सिर्फ कानून व्यवस्था को चुनौती दी थी बल्कि शासन प्रशासन और सियासत के गठजोड़ को भी बेनकाब कर दिया था। जिसमें वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के घटना स्थल पर देरी से पहुंचने के कारण वकीलों का गुस्सा सातवें आसमान पर था। वकीलों ने साफ कर दिया था कि जब तक हत्यारों की पहचान कर उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाता, वे शव उठाने नहीं देंगे। स्थिति इस कदर बेकाबू हो चुकी थी कि मौके पर पीएसी और रैपिड एक्शन फोर्स को तैनात करना पड़ा। पुलिस को घटनास्थल से शव को मोर्चरी भेजने में करीब चार घंटे से अधिक की मशक्कत करनी पड़ी थी। हत्याकांड में 6 लोगों को नामजद किया गया था जिसमें 3 लोगों की दौराने मुकदमा पैरवी मौत हो जाने पर शेष तीन अभियुक्त बचे है ।परिजनों द्वारा 23 वर्ष लड़ी लंबी लड़ाई के बाद आए कोर्ट के फैसले ने परिजनों को संतुष्ट करने के काम करते हुए तीन अभियुक्तों का दोष सिद्ध करते हुए फैसला सुरक्षित रखते हुए फैसले की तारीख 7 जुलाई तय की है।
जानकारी के अनुसार वर्ष 2002 में 8 अगस्त को जब शाम चार बजे अधिवक्ता इन्द्रदेव सिंह अपने चैंबर से निकल कर घर जाने के लिए अपने स्कूटर से निकले कैसर बाग़ में एक दुकान पर पान खा कर जैसे ही चले वैसे ही एक युवक न उनसे लिफ्ट मांगी स्कूटर पर उस युवक को बैठाकर जैसे अधिवक्ता आगे चले उस युवक ने उनकी कनपटी से तमंचा सटाकर गोली मार दी जिससे उनकी तुरंत मौत हो गोली मारने की बाद युवक ने पान की दुकान पर जाकर आप कपड़ों पर लगे खून को धोया इस दौरान एक सफेद कार भी पीछे लगी थी लेकिन युवक बाइक पर बैठक कर निकल गया और कार भी मौके से निकल गई दिनदहाड़े इस हत्याकांड की खबर आग की तरह फैली और देखते ही देखते सैकड़ों वकील घटनास्थल पर जमा हो गए। आक्रोशित वकीलों ने कमिश्नर कार्यालय के घेराव के साथ सड़कें जाम कर दीं और पुलिस के खिलाफ जमकर नारेबाजी करते हुए पथराव शुरू कर दिया। जिसमें वरिष्ठ अधिकारियों के घटना स्थल पर देर से पहुंचने पर वकीलों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया और पुलिस को शव अपने कब्जे में लेने में करीब चार घंटे मशक्कत करनी पड़ी बाद में वकीलों के दबाव को देखते हुए प्रदेश सरकार ने मामले की तफ्तीश एसटीएफ को सौंप दी। एसटीएफ की जांच ने राहुल गौतम और प्रशांत कुमार के नाम मुख्य शूटर और आरोपितों के तौर पर सामने आए, जिन्होंने इस पूरी वारदात को अंजाम दिया था। वकीलों के आंदोलन को देखते हुए राज्य सरकार ने इस केस की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) को ट्रांसफर कर दी। सीबीआइ ने कोर्ट में राहुल गौतम, प्रशांत कुमार और अन्य आरोपितों के खिलाफ पुख्ता सबूतों के साथ चार्जशीट दाखिल की और मुकदमा चलाया। हत्याकांड में छह आरोपितों को नामजद किया गया था, जिनमें से एक कुख्यात अपराधी विक्रम यादव भी था। वह फरवरी 2003 से एक अन्य मामले में जेल की सजा काट रहा था। जांच के दौरान इस हत्याकांड में भी उसकी संलिप्तता पाई गई थी। हालांकि, वर्ष 2004 में कोर्ट में पेशी के दौरान यह शातिर अपराधी पुलिस अभिरक्षा से चकमा देकर फरार होने में कामयाब रहा था।
पत्नी ने मकान विवाद को लेकर हत्या करने का दर्ज कराया था केस
वारदात की सूचना मिलते ही इंद्रदेव सिंह की पत्नी नयनतारा, जो स्वयं एक प्रांतीय सिविल सेवा (पीसीएस) अधिकारी थीं, अपने बेटे रिंकी के साथ मौके पर पहुंचीं। उन्होंने मुकदमा दर्ज कराया था। हत्या एक मकान के विवाद को लेकर की गई थी। नयनतारा का उनके पड़ोस में रहने वाली डॉक्टर सुषमा वर्मा और उनके पति सुरेश वर्मा से एक मकान को लेकर पुराना विवाद चल रहा था। सुरेश वर्मा उस समय अतिरिक्त गन्ना आयुक्त के पद पर तैनात एक रसूखदार पीसीएस अधिकारी थे। प्राथमिकी के अनुसार, वर्मा दंपती ने विवादित मकान भाजपा के पूर्व सहकारिता मंत्री राम कुमार वर्मा को सौंप दिया था, जिस पर वर्तमान में उनके भाई सुरजन लाल वर्मा का कब्जा था। इस प्रकरण में पुलिस ने पीसीएस अधिकारी सुरेश वर्मा और उनकी पत्नी डा. सुषमा वर्मा को हिरासत में ले लिया था।
























