सम्भल में डीएम एसपी की नमाजियों की संख्या सीमित करने की याचिका पर हाईकोर्ट ने लगाई फटकार
कोर्ट ने कहा नमाजियों की संख्या समिति नहीं की जा सकती इस्तीफा दे दे या तबादला करा ले अधिकारी
मुजीब खान
प्रयागराज । उत्तर प्रदेश के जनपद सम्भल के डीएम एसपी द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट में नमाजियों की संख्या सीमित करने के आदेश जारी करने की याचिका डाली थी ताकि लोग सड़कों पर नमाज न पड़ सके जिस पर आज हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए डीएम एसपी को कड़ी लताड़ लगाते हुए कहा कि किसी भी धार्मिक स्थल में इबादत या पूजा करने वालो की संख्या सीमित करने का अधिकारी किसी के पास नहीं है इस लिए इस याचिका पर निर्णय नहीं लिया जा सकता कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि जिस अधिकारी को इससे परेशानी हो रही है वह अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दे या जिले से अपना ट्रांसफर करवा ले याचिका पर अगली सुनवाई को कोर्ट ने 16 मार्च की तारीख नियत की है।
संभल में रमजान के दौरान नमाज रोके जाने के मामले पर आज इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नमाजियों की संख्या सीमित करने के स्थानीय प्रशासन के फैसले पर सख्त रुख अपनाया है। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि मस्जिद में नमाजियों की संख्या सीमित नहीं की जा सकती अगर अधिकारी कानून-व्यवस्था सुनिश्चित नहीं कर सकते तो इस्तीफा दें या तो तबादला करवा लें इस केस को जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की डिवीजन बेंच सुन रही है
संभल मामले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि राज्य का कर्तव्य है कि वो यह सुनिश्चित करे कि हर हाल में कानून का राज कायम रहे कोर्ट ने कहा कि यदि स्थानीय अधिकारियों, पुलिस अधीक्षक और कलेक्टर को लगता है कि कानून-व्यवस्था की ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है जिसके कारण वे परिसर के अंदर पूजा करने वालों की संख्या सीमित करना चाहते हैं, तो उन्हें या तो अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए या संभल से बाहर अपना तबादला करवा लेना चाहिए।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की डिवीजन बेंच ने कहा कि राज्य का कर्तव्य है कि वो यह सुनिश्चित करें कि हर समुदाय निर्धारित पूजा स्थल पर शांतिपूर्वक पूजा-अर्चना कर सकें. अगर वह कोई निजी संपत्ति है जैसा कि न्यायालय पहले ही तय कर चुका है तो वो राज्य से बिना किसी अनुमति के पूजा कर सकें. कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य का हस्तक्षेप केवल तभी आवश्यक होता है और अनुमति केवल तभी मांगी जानी चाहिए जब प्रार्थनाएं या धार्मिक कार्यक्रम सार्वजनिक भूमि पर आयोजित किए जाने हों या सार्वजनिक संपत्ति तक फैल रहे हों।
कोर्ट ने राज्य की तरफ से दी गई दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि राज्य का यह कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि हर समुदाय किसी तय पूजा स्थल पर या निजी संपत्ति पर बिना किसी सरकारी अनुमति के शांतिपूर्वक प्रार्थना कर सकें। कोर्ट ने कहा कि परिस्थितियों को देखते हुए राज्य ने इस मामले में निर्देश लेने के लिए समय मांगा है और याचिकाकर्ता एक पूरक हलफनामा दायर करना चाहता है. जिसमें वह तस्वीरें और राजस्व रिकॉर्ड पेश करके यह दिखाएगा कि नमाज कहां अदा की जानी है।कोर्ट ने राज्य सरकार की मांग को मंजूर करते हुए अब इस मामले की सुनवाई 16 मार्च को करेगी।
























