
सापेक्षता के बंधनों और कार्य-कारण के नियमों से परे है अद्वैत का सत्य: डॉ. विद्यासागर उपाध्याय
संजीव सिंह बलिया।जमुआ, बलिया स्थित शिक्षा शक्तिसापेक्षता के बंधनों और कार्य-कारण के नियमों से परे है अद्वैत का सत्य: डॉ. विद्यासागर उपाध्याय जमुआ, बलिया स्थित शिक्षा शक्ति सहयोग संस्थान के तत्वावधान में स्वामी विवेकानन्द जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित विशेष एकल व्याख्यान के अंतर्गत आज आध्यात्मिक चेतना और आधुनिक विज्ञान के अंतर्संबंधों पर एक बौद्धिक विमर्श संपन्न हुआ। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता व मुख्य अतिथि, प्रख्यात दार्शनिक चिंतक डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने “सापेक्षतावाद से अद्वैत तक: स्वामी विवेकानंद की दृष्टि में देश, काल और कार्य-कारण की वैज्ञानिकी मीमांसा” विषय पर अपना अत्यंत सारगर्भित और विद्वत्तापूर्ण व्याख्यान प्रस्तुत किया। अपने उद्बोधन की शुरुआत करते हुए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने कहा कि स्वामी विवेकानंद केवल एक आध्यात्मिक संत नहीं थे, बल्कि वे एक सूक्ष्म वैज्ञानिक दृष्टि रखने वाले मनीषी थे। उन्होंने आधुनिक विज्ञान की जटिल खोजों से दशकों पहले ब्रह्मांड के रहस्यों को तार्किक रूप से परिभाषित कर दिया था। डॉ. उपाध्याय ने विस्तार से समझाया कि देश (स्पेस), काल (टाइम) और निमित्त (काशन) वे मानसिक चश्मे हैं, जिनके माध्यम से हम एक ही अनंत सत्य को अनेक रूपों में देखते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि जिसे आज विज्ञान ‘सापेक्षता’ (रिलेटिविटी) कहता है, उसे स्वामी विवेकानंद ने ‘माया’ के रूप में परिभाषित किया था—अर्थात वह सत्य जो परिवर्तनशील है और प्रेक्षक (आब्जर्वर) की दृष्टि पर निर्भर करता है। व्याख्यान के महत्वपूर्ण अंश में डॉ. उपाध्याय ने ‘कार्य-कारण’ के सिद्धांत पर गहरा प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह संपूर्ण जगत कार्य-कारण के एक जटिल जाल में बंधा है, जिसे विज्ञान ‘नियम’ कहता है। लेकिन स्वामी विवेकानंद की दृष्टि में यह नियम केवल स्थूल जगत तक सीमित है। जैसे ही मनुष्य अपनी चेतना को अद्वैत के स्तर पर ले जाता है, वह इन सभी प्राकृतिक नियमों और कार्य-कारण के बंधनों से मुक्त हो जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अद्वैत वेदांत और आधुनिक भौतिकी (जैसे क्वांटम मैकेनिक्स) एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जहाँ अंततः पदार्थ और चेतना का भेद मिट जाता है। कार्यक्रम के आयोजक विवेक कुमार सिंह ने डॉ. विद्यासागर उपाध्याय का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि बलिया की धरती हमेशा से ज्ञान और क्रांति की धरा रही है। इस तरह के बौद्धिक विमर्श से बलिया की गौरवशाली ज्ञान-परंपरा को नई ऊर्जा मिलती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि नई पीढ़ी और विद्यार्थियों को स्वामी विवेकानंद के ‘वैज्ञानिक राष्ट्रवाद’ और ‘तार्किक आध्यात्मिकता’ से जोड़ना वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है और संस्थान इसके लिए सदैव संकल्पित रहेगा। व्याख्यान के उपरांत एक जीवंत प्रश्न-उत्तर सत्र का आयोजन हुआ। इसमें डॉ. उपाध्याय ने विद्यार्थियों और प्रबुद्धजनों द्वारा पूछे गए जटिल वैज्ञानिक प्रश्नों—जैसे ऊर्जा का संरक्षण और चेतना का अस्तित्व—का अत्यंत सरल, सटीक और तार्किक उत्तर देकर उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया। इस अवसर पर भारी संख्या में क्षेत्र के शिक्षाविद, वरिष्ठ बुद्धिजीवी और युवा छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। कार्यक्रम में भारत माता, काली माता और स्वामी विवेकानंद जी की वंदना संयुक्त रूप से कनिष्ठ प्रताप सिंह, साक्षी सिंह, रुद्र प्रताप सिंह और राज मिश्रा द्वारा प्रस्तुत किया गया। अध्यक्षता पण्डित रामनारायण जी और संचालन विवेक कुमार सिंह ने किया सहयोग संस्थान के तत्वावधान में स्वामी विवेकानन्द जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित विशेष एकल व्याख्यान के अंतर्गत आज आध्यात्मिक चेतना और आधुनिक विज्ञान के अंतर्संबंधों पर एक बौद्धिक विमर्श संपन्न हुआ। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता व मुख्य अतिथि, प्रख्यात दार्शनिक चिंतक डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने “सापेक्षतावाद से अद्वैत तक: स्वामी विवेकानंद की दृष्टि में देश, काल और कार्य-कारण की वैज्ञानिकी मीमांसा” विषय पर अपना अत्यंत सारगर्भित और विद्वत्तापूर्ण व्याख्यान प्रस्तुत किया। अपने उद्बोधन की शुरुआत करते हुए डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने कहा कि स्वामी विवेकानंद केवल एक आध्यात्मिक संत नहीं थे, बल्कि वे एक सूक्ष्म वैज्ञानिक दृष्टि रखने वाले मनीषी थे। उन्होंने आधुनिक विज्ञान की जटिल खोजों से दशकों पहले ब्रह्मांड के रहस्यों को तार्किक रूप से परिभाषित कर दिया था। डॉ. उपाध्याय ने विस्तार से समझाया कि देश (स्पेस), काल (टाइम) और निमित्त (काशन) वे मानसिक चश्मे हैं, जिनके माध्यम से हम एक ही अनंत सत्य को अनेक रूपों में देखते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि जिसे आज विज्ञान ‘सापेक्षता’ (रिलेटिविटी) कहता है, उसे स्वामी विवेकानंद ने ‘माया’ के रूप में परिभाषित किया था—अर्थात वह सत्य जो परिवर्तनशील है और प्रेक्षक (आब्जर्वर) की दृष्टि पर निर्भर करता है। व्याख्यान के महत्वपूर्ण अंश में डॉ. उपाध्याय ने ‘कार्य-कारण’ के सिद्धांत पर गहरा प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह संपूर्ण जगत कार्य-कारण के एक जटिल जाल में बंधा है, जिसे विज्ञान ‘नियम’ कहता है। लेकिन स्वामी विवेकानंद की दृष्टि में यह नियम केवल स्थूल जगत तक सीमित है। जैसे ही मनुष्य अपनी चेतना को अद्वैत के स्तर पर ले जाता है, वह इन सभी प्राकृतिक नियमों और कार्य-कारण के बंधनों से मुक्त हो जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अद्वैत वेदांत और आधुनिक भौतिकी (जैसे क्वांटम मैकेनिक्स) एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जहाँ अंततः पदार्थ और चेतना का भेद मिट जाता है। कार्यक्रम के आयोजक विवेक कुमार सिंह ने डॉ. विद्यासागर उपाध्याय का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि बलिया की धरती हमेशा से ज्ञान और क्रांति की धरा रही है। इस तरह के बौद्धिक विमर्श से बलिया की गौरवशाली ज्ञान-परंपरा को नई ऊर्जा मिलती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि नई पीढ़ी और विद्यार्थियों को स्वामी विवेकानंद के ‘वैज्ञानिक राष्ट्रवाद’ और ‘तार्किक आध्यात्मिकता’ से जोड़ना वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है और संस्थान इसके लिए सदैव संकल्पित रहेगा। व्याख्यान के उपरांत एक जीवंत प्रश्न-उत्तर सत्र का आयोजन हुआ। इसमें डॉ. उपाध्याय ने विद्यार्थियों और प्रबुद्धजनों द्वारा पूछे गए जटिल वैज्ञानिक प्रश्नों—जैसे ऊर्जा का संरक्षण और चेतना का अस्तित्व—का अत्यंत सरल, सटीक और तार्किक उत्तर देकर उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया। इस अवसर पर भारी संख्या में क्षेत्र के शिक्षाविद, वरिष्ठ बुद्धिजीवी और युवा छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। कार्यक्रम में भारत माता, काली माता और स्वामी विवेकानंद जी की वंदना संयुक्त रूप से कनिष्ठ प्रताप सिंह, साक्षी सिंह, रुद्र प्रताप सिंह और राज मिश्रा द्वारा प्रस्तुत किया गया। अध्यक्षता पण्डित रामनारायण जी और संचालन विवेक कुमार सिंह ने किया

