शिक्षा क्षेत्र हनुमानगंज: धर्मपुर के प्रधानाध्यापक का व्यक्तित्व शिक्षण और सृजन काअनूठा उदाहरण
संजीव सिंह बलिया।शिक्षण के साथ साहित्य साधना में भी रचा-बसा है धर्मपुर के प्रधानाध्यापक का व्यक्तित्व
शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं, बल्कि साहित्य और सृजन के माध्यम से समाज को दिशा देने का भी माध्यम है। इसी भावना को आत्मसात किए हुए हैं प्राथमिक विद्यालय धर्मपुर, शिक्षा क्षेत्र हनुमानगंज के प्रधानाध्यापक एवं पूर्व आरपी शिक्षा क्षेत्र हनुमानगंज।
हिंदी साहित्य के प्रति गहरा अनुराग
शिक्षण के साथ हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति उनकी गहरी रुचि उन्हें विशिष्ट पहचान प्रदान करती है। हिंदी के प्रति उनका लगाव केवल अध्ययन और अध्यापन तक सीमित नहीं है। वे स्वयं हिंदी में रचनाएं एवं कविताएं लिखते हैं और साहित्यिक हिंदी को अपने प्रिय विषय के रूप में देखते हैं। भाषा की बारीकियों, शब्दों की सुंदरता और साहित्य की संवेदनशीलता के प्रति उनका विशेष अनुराग उनकी रचनात्मक अभिव्यक्ति में भी दिखाई देता है।
पिता से मिली साहित्यिक विरासत
साहित्य के प्रति यह अनुराग उन्हें विरासत में भी मिला है। उनके पिताजी भी हिंदी के विद्वान और साहित्य के प्रति गहरी रुचि रखने वाले व्यक्तित्व थे। पिता से मिली साहित्यिक संस्कारों की विरासत को उन्होंने अपने जीवन में आगे बढ़ाया और हिंदी भाषा के प्रति अपनी रुचि को निरंतर समृद्ध किया।
बच्चों में जगाते हैं भाषा प्रेम
प्रधानाध्यापक के रूप में विद्यालय में बच्चों को शिक्षा देने के साथ-साथ वे भाषा और साहित्य के प्रति प्रेम जगाने को भी महत्वपूर्ण मानते हैं। उनका मानना है कि हिंदी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि हमारी संवेदना, संस्कृति और विचारों की सशक्त अभिव्यक्ति है। शिक्षा, साहित्य और सृजन के त्रिवेणी संगम के रूप में उनका व्यक्तित्व नई पीढ़ी के लिए प्रेरणादायी है।
स्थानीय साहित्य जगत में सम्मान
धर्मपुर के इस प्रधानाध्यापक का व्यक्तित्व न केवल शिक्षा जगत में बल्कि साहित्यिक वृत्त में भी सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। उनकी रचनाएं स्थानीय स्तर पर पाठकों तक पहुंच रही हैं और युवा पीढ़ी को हिंदी साहित्य की ओर आकर्षित कर रही हैं।
























