बलिया।मुंशी प्रेमचंद जयंती पर डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो नई पुस्तकों का लोकार्पण, इतिहास और साहित्य का अनूठा संगम

मुंशी प्रेमचंद जयंती पर डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की दो नई पुस्तकों का लोकार्पण, इतिहास और साहित्य का अनूठा संगम

संक्रान्ति का संहार – पानीपत की महागाथा’ और ‘काल यात्रा – वेद से बर्लिन तक’ तीन वर्षों के शोध का परिणाम*

बलिया। संजीव सिंह

अमर कथाकार मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर साहित्यकार एवं इतिहासकार डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने अपनी दो नई कृतियाँ—’संक्रान्ति का संहार – पानीपत की महागाथा’ और ‘काल यात्रा – वेद से बर्लिन तक’—पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कीं। लेखक के अनुसार इन दोनों पुस्तकों के लेखन में लगभग तीन वर्षों तक गहन शोध, सैकड़ों प्रामाणिक स्रोतों का अध्ययन और व्यापक साहित्यिक व दार्शनिक चिंतन किया गया है।

डॉ. उपाध्याय ने बताया कि ‘संक्रान्ति का संहार’ केवल तीसरे पानीपत युद्ध का वर्णन नहीं, बल्कि उस दौर के समाज, संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं का साहित्यिक पुनर्सृजन है। इसमें सदाशिवराव भाऊ, विश्वासराव, इब्राहिम खान गार्दी, दत्ताजी सिंधिया सहित अनेक ऐतिहासिक पात्रों और सामान्य सैनिकों के त्याग, साहस और मानवीय पक्ष को प्रमाणिक ऐतिहासिक संदर्भों के साथ प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक के लिए फारसी हस्तलिपियों के अनुवाद, पेशवा कार्यालय के पत्राचार और मराठी मोड़ी लिपि के दस्तावेजों सहित कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोतों का अध्ययन किया गया है।

वहीं, ‘काल यात्रा – वेद से बर्लिन तक’ कहानी-संग्रह में 21 कहानियाँ शामिल हैं, जो वैदिक काल से लेकर बर्लिन की दीवार के पतन तक मानव सभ्यता की विचार-यात्रा, प्रेम, त्याग और चेतना को साहित्यिक रूप में प्रस्तुत करती हैं। लेखक ने बताया कि इसके लिए वैदिक, उपनिषदिक, बौद्ध, जैन, मध्यकालीन और आधुनिक ऐतिहासिक स्रोतों का व्यापक अध्ययन किया गया है।

डॉ. उपाध्याय ने कहा, “मेरा उद्देश्य इतिहास को बदलना नहीं, बल्कि इतिहास के भीतर छिपे मनुष्य की आवाज़ को सामने लाना है। इतिहास तिथियाँ और नाम देता है, जबकि साहित्य उन नामों के पीछे की आत्मा को पहचानने का अवसर देता है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि दोनों कृतियाँ ऐतिहासिक प्रमाणिकता और साहित्यिक कल्पना का संतुलित मेल हैं।

लेखक ने बताया कि दोनों पुस्तकों में विस्तृत संदर्भ सूची भी दी गई है। पानीपत पर आधारित उपन्यास में सर जदुनाथ सरकार, जी.एस. सरदेसाई सहित कई इतिहासकारों के शोधग्रंथों का उपयोग किया गया है, जबकि ‘काल यात्रा’ में ऋग्वेद, बृहदारण्यक उपनिषद, महाभारत, कालिदास, हर्षचरित और बर्लिन दीवार से जुड़े आधुनिक दस्तावेजों को आधार बनाया गया है। दोनों पुस्तकें शीघ्र ही प्रमुख प्रकाशक के माध्यम से उपलब्ध कराई जाएंगी।

साहित्य और इतिहास में रुचि रखने वाले पाठकों, शोधार्थियों, शिक्षकों और विद्यार्थियों ने इन कृतियों को लेकर उत्साह व्यक्त किया है। लेखक ने इन्हें ‘ऐतिहासिक प्रेरित साहित्यिक कल्पना’ बताते हुए कहा कि इनका उद्देश्य इतिहास का प्रतिस्थापन नहीं, बल्कि इतिहास के भीतर छिपी मानवीय संवेदनाओं को पाठकों तक पहुँचाना है। मुंशी प्रेमचंद को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्होंने पाठकों से इन पुस्तकों को समय और समाज के साथ संवाद के रूप में पढ़ने का आग्रह किया।

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