नवरात्र स्थापना 19 को ,माता का आगमन होगा पालकी पर।
उपेन्द्र कुमार पांडेय
आजमगढ़। देवीभागवत पुराण के अनुसार, गुरुवार को नवरात्र शुरू होने पर माता का डोली (पालकी) पर आगमन होता है, जिसे आर्थिक मंदी, बीमारियों या प्राकृतिक आपदाओं के संकेत के रूप में देखा जाता है,
वहीं 27 मार्च को माता का हाथी पर प्रस्थान करना बेहद शुभ माना जाता है, जो कृषि और खुशहाली में वृद्धि लाता है
19 मार्च को प्रातः 06.54 तक अमावस्या रहेगी उसके उपरांत प्रतिपदा तिथि में शुभ मुहूर्त में घटस्थापना करें। सामान्यतः
हमारी दिव्य सनातन परंपरा में नूतन संवतसरारंभ में शक्तिस्वरुपा जगदंबा दुर्गा पूजन नवरात्रि के रूप में किया जाता है, सायन गणना में सूर्य मेष राशि में आने से सूर्य उत्तर गोल में प्रवेश करते हैं इस समय सूर्य के विषुवत रेखा पर रहने के कारण रात्रि एवं दिन का कालमान बराबर हो जाता है तब ऋषियों ने इस समय को शक्ति साधना के लिए उत्तम माना, भगवती दुर्गा भगवान श्री कृष्ण की आदिशक्ति महामाया है श्री कृष्ण पुरुष और दुर्गा प्रकृति है। चैत्र एवं आश्विन मास में साधना शक्ति रूप से होती है।
इस बार संवत् 2083 में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नवरात्रि प्रारंभ के समय प्रतिपदा तिथि का क्षय हो रहा है इसलिए अमायुक्त प्रतिपदा में ही किया जाना नवरात्र स्थापना किया शास्त्र विहित होगा, वैसे भगवती दुर्गा का आवाहन,विसर्जन आदि समस्त कर्म सूर्य की उदय होने वाली तिथि में ही करना चाहिए, अमायुक्त प्रतिपदा में नहीं करना चाहिए, जैसा कि मार्कंडेय पुराण का कथन है *पूर्व* *विद्धा तु या शुक्ला भवेत्* *प्रतिपदाश्विनी।*
नवरात्रं व्रतं तस्यां न कार्यं शुभमिच्छता* ।। मगर इस बार शक्ति स्वरूप सूर्य प्रतिपदा को स्पर्श नही *पर-दिने प्रतिपदो असत्वे अमायुक्तापिग्राह्या
अमायुक्तापि कर्तव्येति नृसिंह प्रसादोदाहृत वचनान्येत्द्विषयाणि
अमावस्या का अंतिम भाग *कुहू* संज्ञक होता है जो पितृकार्य के लिए होती है, इसमें चंद्रमा की एक कला भी दृश्यमान नहीं होती, इस अमावस्या युक्त प्रतिपदा में नवरात्रा स्थापना नहीं होती, मगर शक्तिस्वरूप सूर्य के प्रतिपदा को स्पर्श नहीं करने के कारण 9 दिनों में 2700 घट्यात्मक रात्रिमान की साधना पूरी नहीं होती। इसलिए अमायुक्त प्रतिपदा को नवरात्र स्थापना करना आवश्यक हो जाता है प्रतिपदा तिथि के देवता अग्निदेव है, कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को भगवती को सर्वस्व अर्पण करके अमायुक्त प्रतिपदा में प्रथमत: भगवान सूर्य का ध्यान अर्चन, स्मरण करके भगवती की साधना आरंभ करनी चाहिए।
(ज्योतिष भूपेंद्रानन्द महाराज)
























