आजमगढ़।त्याग, मोहब्बत और रिश्तों की बेमिसाल दास्तान..

त्याग, मोहब्बत और रिश्तों की बेमिसाल दास्तान….

उपेन्द्र कुमार पांडेय 

आजमगढ़।आज के दौर में, जब लोग छोटी-छोटी बातों पर रिश्तों को भुला देते हैं, वहीं कुछ घराने ऐसे भी हैं जो अपनी मोहब्बत, कुर्बानी और वफ़ादारी से इंसानियत की नई मिसाल पेश करते हैं। यह कहानी मोहल्ला पहाड़पुर,आजमगढ़ के ऐसे ही एक परिवार की है, जिसे पढ़कर हर संवेदनशील दिल की आँखें नम हो सकती हैं।

कुछ साल पहले शिब्ली नेशनल इंटर कॉलेज के सहायक अध्यापक व मरहूम शफात अहमद खान के पुत्र जनाब ज़ाहिद खान साहब की सन 1991 में दोनों किडनियाँ खराब हो गई थीं। हालत इतनी नाज़ुक हो गई कि उनकी ज़िंदगी बचाने के लिए किडनी ट्रांसप्लांट ज़रूरी हो गया। उस मुश्किल वक़्त में, जब हर तरफ़ मायूसी छाई हुई थी, उनके भाई मोहम्मद आसिम खान (कक्कू भाई) ने बिना किसी झिझक के अपनी किडनी उन्हें दान दे दी।

भाई की इस अज़ीम कुर्बानी ने ज़ाहिद साहब को नई ज़िंदगी बख्श दी। पूरे परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई और ऐसा लगा कि मोहब्बत ने मौत को भी मात दे दी हो।

लेकिन शायद इम्तिहान अभी बाकी था।

करीब 29 साल बाद सन 2021 में उनकी तबीयत फिर बिगड़ने लगी। जब डॉक्टरों ने पूरी जाँच की, तो जो हक़ीक़त सामने आई उसने पूरे परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया। डॉक्टरों ने बताया कि उनकी किडनी दोबारा खराब हो चुकी है और साथ ही उनका लीवर भी बुरी तरह मुतास्सिर हो गया है।

यह खबर किसी बिजली गिरने से कम नहीं थी। घर का हर शख्स परेशान था, हर आँख में फ़िक्र थी और हर दिल दुआ कर रहा था। लेकिन जहाँ सच्ची मोहब्बत हो, वहाँ उम्मीद कभी खत्म नहीं होती।

इस बार उनकी अहलिया (पत्नी) सीमा ज़ाहिद ने अपने शौहर की ज़िंदगी बचाने के लिए एक ऐसा फैसला किया, जो हर किसी के बस की बात नहीं। उन्होंने अपनी किडनी दान करने का फैसला कर लिया। एक बीवी ने अपने हमसफ़र को बचाने के लिए अपने जिस्म का हिस्सा तक दे दिया।

उधर उनके दूसरे भाई सालिम खान ने भी आगे बढ़कर अपना लीवर दान कर दिया। एक तरफ़ बीवी की बेपनाह मोहब्बत थी, दूसरी तरफ़ भाइयों की बेमिसाल कुर्बानी। इन सबने मिलकर ज़ाहिद साहब को ज़िंदगी का एक और मौका दे दिया।

यह सिर्फ़ एक मेडिकल ऑपरेशन की कहानी नहीं है, बल्कि रिश्तों की उस ताक़त की दास्तान है जहाँ मोहब्बत सिर्फ़ अल्फ़ाज़ में नहीं, बल्कि अपने जिस्म का हिस्सा देकर साबित की जाती है।

जब एक भाई अपनी किडनी दे दे, दूसरा भाई अपना लीवर दे दे और एक बीवी अपने शौहर के लिए हर कुर्बानी देने को तैयार हो जाए, तब समझ में आता है कि रिश्ते सिर्फ़ नाम के नहीं होते, बल्कि दिल से निभाए जाते हैं।

आज के इस खुदगर्ज़ दौर में ज़ाहिद साहब का परिवार हमें यह पैग़ाम देता है कि अगर परिवार साथ खड़ा हो, तो बड़ी से बड़ी मुसीबत का भी मुकाबला किया जा सकता है।

हम अल्लाह तआला से दुआगो हैं कि वह जनाब ज़ाहिद खान साहब को मुकम्मल सेहत, लंबी उम्र और खुशहाल ज़िंदगी अता फ़रमाए तथा उनके परिवार की इन कुर्बानियों को अपनी बारगाह में कबूल फ़रमाए।

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