बलिया।प्रीपेड मीटर: सुधार या नया संकट? उपभोक्ताओं में बढ़ता असंतोष”

प्रीपेड मीटर: सुधार या नया संकट? उपभोक्ताओं में बढ़ता असंतोष”

अमर बहादुर सिंह बलिया शहर,नगरा 

देश में बिजली सुधारों के नाम पर लागू की जा रही प्रीपेड मीटर व्यवस्था अब एक नई बहस का केंद्र बनती जा रही है। जहां सरकार इसे पारदर्शिता, बिलिंग सुधार और बिजली चोरी रोकने का प्रभावी उपाय बता रही है, वहीं जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग तस्वीर पेश कर रही है। आम उपभोक्ताओं के लिए यह व्यवस्था धीरे-धीरे एक गंभीर समस्या का रूप लेती नजर आ रही है।

ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रहने वाले उपभोक्ताओं का कहना है कि प्रीपेड मीटर उनके लिए सुविधा नहीं, बल्कि अतिरिक्त बोझ बन गया है। जिन इलाकों में आज भी बिजली की आपूर्ति नियमित नहीं है, वहां पहले से ही परेशान लोग अब रिचार्ज और बैलेंस खत्म होने की नई चिंता में घिर गए हैं। कई जगहों पर यह स्थिति ऐसी हो गई है कि बिजली होने के बावजूद बैलेंस खत्म होने पर घर अंधेरे में डूब जाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रीपेड मीटर व्यवस्था को सीधे लागू करने के बजाय इसे एक विकल्प के रूप में पेश किया जाना चाहिए था। बड़े शहरों और आर्थिक रूप से सक्षम वर्ग के लिए यह व्यवस्था उपयोगी हो सकती है, लेकिन कमजोर और ग्रामीण वर्ग पर इसे थोपना नीतिगत असंतुलन को दर्शाता है।

वहीं, बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। बिजली चोरी रोकने के लिए पहले से ही अलग थाने, पुलिस बल और निगरानी तंत्र मौजूद हैं। इसके बावजूद उपभोक्ताओं पर ही जिम्मेदारी डालना कई लोगों को समझ से परे लग रहा है। यह भी एक बड़ा मुद्दा है कि वर्षों से संविदा पर काम कर रहे लाइनमैन और तकनीकी कर्मचारी आज भी स्थायी नियुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जबकि पूरी व्यवस्था उन्हीं के भरोसे चल रही है।

प्रीपेड मीटर में तकनीकी खराबी आने पर उपभोक्ताओं को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। बिजली घरों के चक्कर लगाने के बावजूद उन्हें समाधान नहीं मिल पाता, क्योंकि वहां मौजूद संविदा कर्मचारियों के पास सीमित अधिकार होते हैं। दूसरी ओर, स्थायी अधिकारी और तकनीकी विशेषज्ञ अक्सर नए मीटर लगाने के कार्यों में व्यस्त रहते हैं।

नीति-निर्माताओं के लिए यह एक चेतावनी का संकेत हो सकता है। बढ़ता असंतोष यदि समय रहते नहीं संभाला गया, तो यह एक बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है। यह केवल मीटर बदलने का मामला नहीं है, बल्कि जनता के विश्वास, सुविधा और बुनियादी अधिकारों से जुड़ा मुद्दा है।

सरकार को चाहिए कि वह इस व्यवस्था की जमीनी हकीकत को समझे, उपभोक्ताओं की समस्याओं का समाधान निकाले और प्रीपेड मीटर को अनिवार्य बनाने के बजाय विकल्प के रूप में लागू करे। अन्यथा, यह सुधार का कदम कहीं सरकार के लिए ही भारी न पड़ जाए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *