हस्तकरघा परंपरा सांस्कृतिक चेतना और आत्मनिर्भरता की प्रतीक : रवि जी समदर्शी
बदायूँ/उझानी। संजीव शर्मा
नगर के मेरे राम आश्रम में आयोजित हैंडलूम उत्सव में भारतीय हस्तकरघा परंपरा, स्वदेशी उत्पादों और आत्मनिर्भरता के महत्व पर वक्ताओं ने विचार व्यक्त किए। रवि जी समदर्शी महाराज ने कहा कि भारतीय हस्तकरघा परंपरा हमारी सनातन सांस्कृतिक चेतना, शिल्प-कौशल और श्रम-साधना की अनुपम अभिव्यक्ति है। हथकरघे पर तैयार होने वाले वस्त्र केवल परिधान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही कला, परंपरा और सृजनशीलता के जीवंत दस्तावेज हैं।
उन्होंने कहा कि स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा देकर स्थानीय बुनकरों और शिल्पकारों की आजीविका को मजबूत करें। देश की अर्थव्यवस्था को स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। स्वदेशी का आग्रह राष्ट्रहित, सांस्कृतिक अस्मिता और आर्थिक स्वाभिमान से जुड़ा है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आवश्यकता की वस्तुओं में स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
गायत्री परिवार के संजीव कुमार शर्मा ने कहा कि भारतीय संस्कृति में श्रम को साधना, स्वावलंबन को जीवन-मूल्य और लोकमंगल को परम ध्येय माना गया है। हस्तकरघा उद्योग हमारी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान करता है। स्वदेशी उत्पादों को अपनाना केवल खरीदारी नहीं, बल्कि बुनकरों, श्रमिकों और कारीगरों के परिश्रम के प्रति सम्मान व्यक्त करना है।
उन्होंने कहा कि स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता मिलने से आर्थिक संसाधनों का प्रवाह स्थानीय स्तर पर बना रहेगा और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। समाज के प्रत्येक वर्ग को स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाकर आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को मजबूत करने में योगदान देना चाहिए। समाजसेवी आदित्य गुप्ता और देवेंद्र पाल ने गायत्री मंत्र का पटका पहनाकर रवि जी समदर्शी महाराज को सम्मानित किया। इस मौके पर सौम्या शर्मा, हेमंत आदि मौजूद रहे।
























